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चेन्नई.इसरो ने रविवार को बाहर (एटमॉस्फियर) की ऑक्सीजन को फ्यूल के रूप में इस्तेमाल करने वाले स्क्रेमजेट इंजन का टेस्ट किया। 5 मिनट का ये टेस्ट कामयाब रहा। इस इंजन को सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC) में बनाया गया है। साइंटिस्ट्स का कहना है कि इंजन का यूज रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) में हाईपरसोनिक स्पीड (साउंड की स्पीड से तेज) हासिल करने के लिए किया जाएगा। इस टेस्ट के साथ ही भारत ने अमेरिका के नासा की बराबरी कर ली है और जापान-चीन-रूस को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे किया गया टेस्ट…
 SDSC में टेस्ट के दौरान स्क्रेमजेट इंजन को दो स्टेज वाले एक रॉकेट (RH-560) में फिट किया गया। इस रॉकेट को 1970 के दशक में बनाया गया था।
टेस्ट रविवार को सुबह 6 बजे किया गया।
इंजन ने जमीन से 20 किमी ऊपर बाहर से ऑक्सीजन ली। ये ऑक्सीजन 5 सेकंड जली। इसके बाद वह बंगाल की खाड़ी में गिर गया।
सामान्य इंजन की तरह नहीं है स्क्रेमजेट

 सामान्य इंजन में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर (ऑक्सीजन को फ्यूल में बदलने वाला सिस्टम) दोनों होते हैं। लेकिन स्क्रेमजेट में ऐसा नहीं है।
स्क्रेमजेट में ऑक्सीजन को फ्यूल की तरह इस्तेमाल करने वाले सिस्टम (एयर-ब्रीदिंग प्रपुल्शन टेक्नोलॉजी) का इस्तेमाल किया गया है। जो एटमॉस्फियर की ऑक्सीजन का इस्तेमाल कर रॉकेट को सुपरसोनिक स्पीड देगा।
इंजन में लिक्विड हाइड्रोजन भी रहेगी। ऑक्सीजन की मौजूदगी में लिक्विड हाइड्रोजन जलेगी जिससे रॉकेट को एनर्जी मिलेगी।
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क्या बोले इसरो साइंटिस्ट?
 साइंटिस्ट्स के मुताबिक, ‘एसडीएससी के लॉन्चपैड से स्क्रेमजेट इंजन लगा रॉकेट छोड़ा गया।’
‘रॉकेट को कुछ दूर ऊपर ले जाने के बाद पहली स्टेज का हिस्सा बंगाल की खाड़ी में गिरा। इसके बाद भी रॉकेट अपनी एनर्जी के बलबूते आगे बढ़ता रहा।’
‘दूसरे स्टेज में जब रॉकेट की स्पीड, साउंड की स्पीड की 6 गुना हो गई, तब 20 किमी की ऊंचाई पर स्क्रेमजेट इंजन ने एटमॉस्फियर की ऑक्सीजन लेकर काम करना शुरू किया। इंजन में ऑक्सीजन करीब 5 सेकंड जली। रॉकेट 40-70 किमी ऊपर पहुंचने के बाद बंगाल की खाड़ी में गिर गया।
साइंटिस्ट्स का ये भी कहना है कि स्क्रेमजेट इंजन हल्का होने के साथ ऑर्बिट में भारी पेलोड स्थापित करने करने में मददगार होगा।
क्यों अहम रहा टेस्ट?
 विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के डायरेक्टर के. सीवान के मुताबिक, ‘ये टेस्ट इस लिहाज से अहम है कि स्क्रेमजेट इंजन को आरएलवी में यूज किया जाएगा।’
‘इंजन में ऑक्सीजन के कंबशन (जलने) और दबाव को लगातार जांचा गया।’
‘इंजन की एयर-ब्रीदिंग टेक्नोलॉजी में उसे हवा में ही ऑक्सीजन लेकर फ्यूल में कन्वर्ट करना है। इससे रॉकेट को सुपरसोनिक स्पीड मिलेगी। अगर हम इसे 5 सेकंड तक कर सकते हैं तो 1000 सेकंड्स तक भी कर सकते हैं।’
‘अब स्क्रेमजेट का फुल स्केल पर आरएलवी में भी टेस्ट किया जाएगा।’
अमेरिका की बराबरी की
 भारत ने स्क्रेमजेट इंजन का टेस्ट कर अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा की बराबरी कर ली है। नासा ने 2004 में ये टेस्ट किया था।
जापान, चीन, रूस और यूरोपीय देशों में भी इसकी टेस्टिंग शुरुआती लेवल पर है।
इससे पहले 2006 में भारत ने स्क्रेमजेट का जमीन पर टेस्ट किया था।
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