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मुंबई हमलों के वक्त पहली बार मार्कोस कमांडो देश के सामने बड़े रूप में सामने आए थे। काली वर्दी, मुंह पर काला कपड़ा और आंखों पर चश्मा पहने इन कमांडोज को देश ने तब टीवी पर देखा था। ये मार्कोस दुश्मन के लिए बेहद घातक हैं और तो और समुद्री लुटेरों के लिए इनका नाम ही कहर है

मार्कोस इंडियन नेवी की एक स्पेथशल ऑपरेशन यूनिट है। मार्कोस कमांडोज को पहले मरीन कमांडो फोर्स यानी एमसीएफ के नाम से भी जाना जाता था। मार्कोस को 26/11 हमले के ऑपरेशन में बुलाया गया था।

मार्कोस इंडियन नेवी के स्पेशल मरीन कमांडोज हैं। स्पे शल ऑपरेशन के लिए इंडियन नेवी के इन कमांडोज को बुलाया जाता है। ये कमांडो हमेशा सार्वजनिक होने से बचते हैं। नौसेना के सीनियर अफसर की मानें तो परिवार वालों को भी उनके कमांडो होने का पता नहीं होता है।

मार्कोस का निकनेम ‘मगरमच्छ ‘ है। इसकी एनिवर्सिरी वैलेंटाइन डे के दिन यानी 14 फरवरी को होती है और इसका मोटो है, ‘द फ्यू द फियरलेस।’ अप्रैल 1986 में नेवी ने एक मैरीटाइम स्पे शल फोर्स की योजना शुरू की। एक ऐसी फोर्स जो मुश्किल ऑपरेशनों और काउंटर टेररिस्टि ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें।

भारतीय नौसेना की इस स्पेशल यूनिट का गठन 1987 में किया गया। जब ऐसा किया गया तब समुद्र में बढ़ते खतरे को देखकर एक ऐसे खास बल की आवश्यकता महसूस की जा रही थी जो समुद्री लुटेरों और आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए समुद्री ऑपरेशन को अंजाम दे सके। इनका मकसद जल से जमीन पर युद्ध छेड़ना है।

भारत के मार्कोस (मरीन) कमांडो सबसे ट्रेंड और मॉर्डन माने जाते हैं। मार्कोस को दुनिया के बेहतरीन यूएस नेवी सील्स की तर्ज पर विकसित किया जाता है।

नेवी का मार्कोस कमांडो बनाना आसान नहीं है। 20 साल उम्र वाले प्रति 10 हजार युवा सैनिकों में एक का चयन मार्कोस फोर्स के लिए होता है। इसके बाद इन्हें अमेरिकी और ब्रिटिश सील्स के साथ ढाई साल की कड़ी ट्रेनिंग करनी होती है। देश के मरीन कमांडो जमीन, समुद्र और हवा में लड़ने के लिए पूरी तरह से सक्षम होते हैं।

कुछ कमांडो आज भी जम्मू9-कश्मी र में आर्मी के साथ जुड़े हुए हैं। वे इलाके में काउंटर टेररिज्मम में आर्मी का साथ देते हैं। 1999 में हुई कारगिल जंग में भी मार्कोस ने भारतीय सेना को काफी मदद की थी।

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